प्राणायाम द्वारा पापरहित योगी अपने पुण्यकर्मों का भी उसी अग्नि में आहुति दे देता है। तात्पर्य यह है कि सभी पाप-पुण्य कर्मों का पूर्णरूप से क्षय हो जाता है। जब कुछ भी फलभोग शेष नहीं रह जाता तभी उसे मोक्ष की उपलब्धि होती है।
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