योगी में वायुधारण की यथेच्छ शक्ति आ जाने पर उसका कुम्भक सिद्ध हो जाता है अर्थात् वह समस्त कार्यों में सामर्थ्यवान् बन जाता है। उसके लिए कुछ भी दुष्यप्य नहीं रह जाता।
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