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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 6
अत्रापि वायवः पश्च मुख्याः स्युर्दर्शिताः पुनः । तत्रापि श्रेष्ठकर्तारौ प्राणापानौ मयोदितौ ।।
उक्त कथित दश वायुओं में भी पाँच वायुओं (प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान) की विशेष रूप से महत्ता रहती है, किन्तु मैंने यहाँ केवल प्राण और अपान - इन दो को ही कहे है।
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