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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 107
नासाप्रे विन्यसेदृ‌ष्टिं दन्तमूलं च जिह्वया । उत्तोल्य चिबुकं वक्ष उत्थाप्य पवनं शनैः ।।
तदनन्तर जिह्वा को दंतमूल में रखकर वक्षःस्थल पर ठुड्डी को बैठा ले तथा अधोवायु को ऊपर की ओर उत्थित कर शक्त्यानुसार धीरे-धीरे पूरक प्राणायाम द्वारा प्राणवायु को स्थिर करे।
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