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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 112
प्रसार्य चरणद्वन्द्वं परस्परमसंयुतम् । स्वपाणिभ्यां दृढं धृत्वा जानूपरि शिरोन्यसेत् ।।
इस आसन का अभ्यास करने के लिए दोनों पैरों को परस्पर मिलाकर उन्हें फैला दें। पुनः दोनों हाथों से पैर के अँगूठों को कसकर पकड़ें और घुटने पर शिर को टिका दें।
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