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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 53
तावत्कालं प्रकुर्वीत योगोक्तनियमग्रहम् । अल्पनिद्रा पुरीषं च स्तोकं मूत्रं च जायते ।।
योगसिद्धाभिलाषी के लिए शास्त्रोक्त नियमों का अनुपालन उस समय तक अनिवार्य होता है जब तक उसे यथेच्छ वायुधारण की शक्ति, अल्पकालिक निद्रा तथा अल्प परिमाण में मल-मूत्र का निस्सरण न होने लगे। अर्थात् जब उसमें निद्रा की अनुभूत्ति कम हो तथा मल-मूत्र के निस्सरण की मात्रा भी घट जाय तो उसे योगसिद्धि की ओर उत्तरोत्तर अग्रसर होते हुए जानना चाहिए।
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