मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 52
योगी पद्मासनस्थोऽपि भुवमुत्सृज्य वर्तते । वायुसिद्धिस्तदाज्ञेया संसारध्वान्तनाशिनी ।।
अर्थात् जिस प्रकार मेंढक भूमि से ऊपर उछल-कूदकर पुनः धरती पर आ जाता है वैसे ही योगाभ्यासी का आसन भी किंचित् ऊपर उठकर पुनः अपने स्थान पर स्थिर हो जाता है। अभ्यास के दृढ़तर हो जाने पर साधक स्वेच्छानुसार गगनचारी बन सकता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिव संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

शिव संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें