कर्मकूटानि प्रणवेन विनाशयेत् ।
स योगी कर्मभोगाय कायव्यूहं समाचरेत् ।।
योगी में इन त्रिकूट कर्मों का बोध हो जाता है जिसे वह ओंकार मंत्रजाप के फलस्वरूप विनाश करने में भी सक्षम हो जाता है। यदि वह पूर्व जन्मार्जित कर्मफलों के भोगने का अभिलाषी हो तो उसे अपनी इच्छा के अनुसार भोग भी सकता है।
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