उसे मांगलिक वचनों का श्रवण, धैर्य, क्षमा, तप, शुचिता तथा लज्जा का भाव रखना आवश्यक बतलाया गया है। गुरु की सेवा में निरन्तर निरत रहकर कथित नियमों का अनुपालन करना आवश्यक होता है। इस प्रकार का साधक अल्पकाल में ही सिद्धि को पा लेता है।
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