अनेन विधिना यो वै ब्रह्माण्डं वेत्ति विग्रहम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ।।
इस प्रकार जो व्यक्ति इस शरीर को ब्रह्माड रूप समझ लेता है, वह सभी पापों से रहित होकर निर्वाणपद प्राप्त कर लेता है। इस रीति से सद्यः योगसिद्धि सुलभ हो जाती है।
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