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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 91
अहर्निशं पिबेद्योगी काकचच्च्वा विचक्षणः । पिबेत्प्राणानिलं तस्य रोगानां संक्षयो भवेत् । दूरश्रुतिर्दूरदृष्टिस्तथास्याद्दर्शनं खलु ।।
जो योगसाधक काकचंचु मुद्रा की सहायता से दिन-रात प्राणवायु का पान किया करता है उसके सभी रोग निःसन्देह रूप से विनष्ट हो जाते हैं। उसमें दूर की बातें सुनने तथा दूर तक देखने की शक्ति भी आ जाती है। ऐसा योगी सूक्ष्म से सूक्ष्मतर पदार्थों के अवलोकन में भी सक्षम हो जाता है।
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