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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 95
वर्षत्रयकृताभ्यासाद्वैरवो भवति ध्रुवम् । अणिमादिगुणान् लब्ध्वा जितभूतगणः स्वयम् ।।
ऐसी साधना लगातार तीन वर्ष तक करने वाला भैरव के समान पराक्रमी होकर अणिमादिक अष्टसिद्धियों को हस्तगत कर लेता है। साधक के अधीन समस्त प्राणी स्वतः ही हो जाया करते हैं।
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