उक्त कथित काकचंचु की मुद्रा द्वारा दोनों सन्ध्याओं में कुंडलिनी की मुखाकृति का ध्यान करता हुआ प्राणवायु का पान करने वाला साधक क्षयरोग (तपेदिक, टी.बी.) से शीघ्र हीं मुक्त हो जाता है।
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