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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 14
गुरुप्रसादतः सर्वं लभ्यते शुभमात्मनः । तस्मात् सेव्योगुरुर्नित्यमन्यथा न शुभं भवेत् ।।
गुरु की प्रसन्नता के फलस्वरूप आत्मा का कल्याण होता है। अतएव निश्छल भाव से गुरु की नित्य ही सेवा करनी चाहिए। अश्रद्धान्वित होकर की जाने वाली गुरु की सेवा से कोई लाभ नहीं होता।
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