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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 80
ततोऽभ्यासक्रमेणैव निष्पत्तियोंगिनो भवेत् । अनादिकर्मबीजानि येन तीर्खाऽमृतं पिबेत् ।।
इस प्रकार के निरन्तराभ्यास द्वारा योगी में निष्पत्यावस्था आ जाती है। वह अनन्त काल से अंकुरित हुए कर्म-बीज को नष्ट कर अमृतपान करने में समर्थ हो जाता है।
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