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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 64
वासिद्धिः कामचारित्वं दूरदृष्टिस्तथैव च । दूरश्रुतिः सूक्ष्मदृष्टिः परकायप्रवेशनम् ।।
ऐसे योगी में स्वेच्छाचरण की समर्थता, किसी दूरस्थ वस्तु की दर्शन-शक्ति, दूरगामी शब्दों की श्रवण-शक्ति, सूक्ष्म से सूक्ष्मतम पदार्थ के अवलोकन की शक्ति तथा किसी अन्य व्यक्ति के शरीर में प्रविष्ट होने की शक्ति भी आ जाती है।
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