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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 118
अनेन विधिना योगी मारुतं साधयेत् सुधीः । देष्ठेन क्रमते व्याधिस्तस्य वायुश्च सिध्यति ।।
इस आसन के द्वारा साधक शरीरस्थ वायु को अविलम्ब वशवर्ती बना लेने में सक्षम हो जाता है। इसके द्वारा शरीर में रोगोत्पत्ति नहीं होती।
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