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शिव संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 89
राजदन्तबिलं गाढं संपीड्य विधिना पिबेत् सन्नाह । ध्यात्वा कुण्डलिनी देवीं षण्मासेन कविर्भवेत् ।।
अपने निचले दाँत से राजदन्त को दबाकर उसके छिद्र से विधिपूर्वक वायुपान तथा कुण्डलिनी देवी का ध्यान करने वाला साधक छह महीने में ही कवि बन जाता है।
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