गुरुः पिता गुरुर्माता गुरुर्देवो न संशयः ।
कर्मणा मनसा वाचा तस्मात् सर्वैः प्रसेव्यते ।।
निस्सन्देह रूप से गुरु ही पिता, माता और देवस्वरूप होता है। अतः शिष्य को मनसा, वाचा, कर्मणा गुरु की सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिए।
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