मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 1 — तथागतगर्भ

रत्नगोत्रविभाग
167 श्लोक • केवल अनुवाद
श्रीवञ्रसत्त्व को नमस्कार है। बुद्ध, धर्म, संघ, धातु, बोधि, गुण तथा कर्म वे ही समस्त महायान शास्त्र के शरीर कहे गए हैं। संक्षेप में वे सात वज्रपद कहलाते हैं।
इस निर्देशन के बाद १६ प्रकार के दलों से संयुक्त महाबोधि करुणा के निर्देश से बुद्ध बोधि परिदीपित होती है। उस निर्देश के बाद, ३२ आकार से युक्त निरुत्तर तथागत कर्म निर्देश से बुद्ध कर्म परिदीपित होता है। इस प्रकार के वे सात वज्रपद स्वलक्षण निर्देश के द्वारा विस्तारपूर्वक उन सूत्तो से जानने चाहिए। इनका अनुश्लेष (सम्बन्ध) क्या है?
बुद्ध से धर्म, धर्म से आर्यसङ्घ, संघ में बोधिगर्भ, जो ज्ञानधातु के अप्रत्व में परिनिष्ठित होता है। उस ज्ञान के द्वारा अग्रगति में अवस्थित बोधिसत्त्व, महासत्त्वो के गणों से सर्वप्राणियों के हित के लिए धर्मप्राप्त होता है। वही ज्ञप्ति भी है।
उस दुःख के अङ्कुर को काटने वाले (बुद्ध को) नमस्कार है। जिस बुद्ध ने आदि, मध्य और अन्तिम रहित शान्त बुद्धत्व को स्वयं ही जानकर मूर्ख-अल्पज्ञ व्यक्तियों को निश्चित मार्ग का उपदेश दिया है, ऐसे ज्ञान कृपा रूपी उत्तम खड्ग के धारण से दुःख रूपी अङ्कुर का छेदन किया है तथा अनेक दिशाओं में परिव्याप्त, मजबूत विमति (मूर्खता) रूप प्राकार (दिवार) का भेदन किया है।
बुद्धत्व में आठ गुण हैं। वे हैं - असंस्कृत, अनाभोग जो अपर प्रत्यय से उदित हुआ है। वही ज्ञान करुणा रूपी शक्ति से युक्त है दो अर्थो - सम्पत्तियों के तरह।
अनादि अमध्य और अनिधन होने से ही यह असंस्कृत है। शान्त धर्मयुक्त होने से ही इसे अनाभोग कहा गया है। (वे आठ गुण कौन से है? १ - असंस्कृतत्व, २ - अनाभोगत्व, ३ - अपरपत्ययत्व, ४ अभिसंबोधि, ५ - ज्ञान, ६ - करुणा, ७ - शक्ति = स्वार्थ संपत्‌ + परार्थसंपत्‌)
प्रत्येक चित्त में बोध होने से, अपर प्रत्यय के रूप में उदित हुआ है। इस प्रकार ज्ञान तीन प्रकार का है - बोध से, करूणा से तथा मार्ग के उपदेश के कारण।
ज्ञान और कृपा के द्वारा साथ ही दुःख और क्लेश के नाश से शक्ति की अवस्थिति होती है। उपर्युक्त आदि के तीन गुणों से स्वार्थ सम्पत्‌ (शक्ति) तथा परार्थ (शक्ति) अन्य तीन गुणों से घोषित होती है।
जो असत्‌ नहीं है, सत्‌ भी नहीं है। सत्‌ और असत्‌ दोनों भी नहीं है। सत्‌ और असत्‌ दोनों से पृथक्‌ भी नहीं है। जिसे तर्क से जानना संभव नहीं है। परिभाषा से ही कुछ जाना जा सकता है। प्रत्यात्मवेद्य और शिव है। ऐसे विमल-ज्ञान को प्रकाशित करने वाले, धर्म के सूर्यस्वरूप, सभी प्रकार के राग दोष जन्य अन्धकार को नाश करने वाले बुद्ध को नमस्कार है।
वे आठ गुण हैं - अचिन्त्य, अद्वय, निर्विकल्प, शुद्धि, अभिव्यक्तिकरण, प्रतिपक्षता, विराग और विराग का कारण। (इस श्लोक से संक्षेप में आठ गुणों से युक्त धर्मरत्न का निर्देश किया गया है।)
इन्हीं ६ गुणों का क्रमशः प्रथम तीन गुणों से निरोधसत्य का परीदीपन करके विराग का संग्रह किया गया है। अवशिष्ट तीनों से मार्गसत्य का परिदीपन करके विराग का हेतु ही अभिव्यक्त हुआ है। जो विराग है वह निरोध सत्य है, जिससे विराग मार्ग सत्य से दोनों ही अभि समय-व्यवदान सत्यरूप द्वयलक्षण ही विरागधर्म है ऐसा परिदीपन हुआ है।
संक्षेप में निरोध सत्य का तीन कारणों से अचिन्त्यता उल्लिखित है। वे तीन हैं असत्‌, सत्‌, सदसत्‌ और दोनों का अभाव करके कभी-कभी चार भी कारण होते हैं क्योंकि वह तर्को से परे है। यह सभी प्रकार के शब्दों के द्वारा किए जाने वाले समस्त वाग्व्यबहार से यह तत्त्व बहुत दूर है। इसके क्षेत्र में यह कभी भी नहीं आता है। और आर्यो के द्वारा यह प्रत्यात्मवेद्य है। स्वसंवेदनात्मक मात्र।
जिन्होंने समग्र प्राणियों के स्वभाव को जान लिया है और नैरात्म्यकोटिरूप शिवस्वरूप को जान लिया है। जिससे उनका चित्त प्रकृति से प्रभास्वर हो गया है तथा क्लेश के स्वभाव के लक्षण से जिनकी बुद्धि सर्वत्र व्यापक हो गयी है, उसी व्यापक बुद्धि से सर्वत्र सम्बुद्धत्व को ही देखते हैं, ऐसे सत्त्वो के विशुद्धि अनन्त विषय रूप ज्ञान-लक्षण युक्त भगवान्‌ को नमस्कार है।
जिन बुद्धिमान और अविवर्तनीय (अडिग) महापुरुषों का आध्यात्मिक ज्ञान और दर्शन यथार्थ रूप से शुद्ध हो जाता है, उनमें अनुत्तर (श्रेष्ठतम) गुणों का समूह प्रकट होता है।
जब कोई व्यक्ति संसार की शान्त धर्मता (यथार्थ प्रकृति) को सही रूप में जान लेता है, तब वह समझता है कि मूल प्रकृति से सब शुद्ध है और क्लेशों का आरम्भ से ही क्षय देखा जा सकता है।
ज्ञेयपर्यन्तगत बुद्धि से सभी प्राणियों में सर्वज्ञ धर्म के अस्तित्व दर्शन से ही भाविकता की सिद्धि होती है।
इस प्रकार जो यह बोध है वह उसके प्रत्यात्मज्ञान का दर्शन ही है। उस ज्ञान की शुद्धि अमल धातु में असङ्ग और प्रतिहत की स्थिति होती है।
ज्ञान और दर्शन की पूर्ण शुद्धि तथा बुद्ध के अनुत्तर ज्ञान को प्राप्त करके, अवैवर्त्य (अडिग अवस्था) को प्राप्त आर्य पुरुष सभी देहधारियों के लिए शरण बन जाते हैं।
शास्ता (बुद्ध), उनके शासन (धर्म) और शिष्यों (संघ) के उद्देश्य से, तथा तीन यानों में प्रवृत्त और तीन प्रकार के कर्मों में श्रद्धा रखने वालों के लिए शरणत्रय (शरणों) का उपदेश किया गया है।
त्यागने योग्य होने से, व्यर्थ धर्म होने से, अभाव होने से, भयमुक्त होने से दो प्रकार का धर्म और आर्य संघ भी अत्यन्त शरण नहीं हो सकते।
पारमार्थिक बुद्धत्व ही संसार का शरण है। क्योंकि बुद्ध का शरीर धर्म ही है और सारे अन्य गुण भी उसी धर्म शरीर के अधीन ही हैं।
वे तीन रत्न हैं। क्योंकि इनका उत्पादन होना ही दुर्लभ है। वे अत्यन्त निर्मल भी हैं। तेजस्वी हैं। संसार के आभूषण हैं। अग्रस्थानीय हैं और निर्विकार भी हैं।
वे समल तथा निर्मल भी हैं। क्योंकि बुद्ध के समग्र कृत्य विमल ही हैं। वे सब परमार्थ दर्शियों के विषय हैं। क्योंकि वे परमार्थ दर्शित व्यक्तियों के द्वारा (या उनमें ही) उत्पन्न होते हैं।
सर्वदर्शियों का जो ज्ञातव्य विषय है बह तीन रत्नों का उत्पत्ति स्थान ही है। वह चार प्रकार का है और अचिन्त्य भी क्योंकि उसके क्रमशः चार कारण हैं।
वे चार कारण हैं - शुद्धि के उपक्लिष्टता के योग से, निःक्लेश विशुद्धि से, अविनिर्भाग धर्म होने से और अविकल्प के कारण ही वह चार प्रकार का विषय अचिन्त्य कहा गया है।
बोध्य, बोधि, उनके अड़ और बोधना इसी क्रम से एक पद हेतु (कारण) है और तीन प्रत्यय हैं उसी के शुद्धि के लिए।
सभी प्राणी बुद्ध ज्ञान के अन्तर्गत ही हैं और वह बुद्ध ज्ञान निर्मल तथा प्रकृति से ही अद्वय है। इसीलिए बुद्ध गोत्र में उक्त अद्वय फल के उपचार से सभी सत्त्वगण बुद्ध गर्भ के अन्तर्गत ही हैं यह कहा गया है।
बुद्ध के ज्ञान के प्रकाश और तथता के अभेद तथा बुद्ध गोत्र होने से भी सभी शरीर धारी बुद्ध गर्भ के अन्तर्गत ही हैंl
स्वभावार्थ, हेत्वर्थ, फलार्थ, कर्मार्थ, योगार्थ, वृत्यर्थ, अवस्था प्रभेदार्थ, सर्वत्रगार्थ, अविकारार्थ के भेद से संक्षेप में दश प्रकार के अर्थों को मन में रखकर परम तत्त्व ज्ञान विषयक तथागत धातु का व्यवस्थान भगवान्‌ ने निर्देश किया है उसे जानना चाहिए।
सदैव प्रकृति से ही असंक्लिष्ट, शुद्ध रत्न और आकाश तथा जल के तरह धर्म के अधिमुक्ति तथा अधिप्रज्ञा, समाधि एवं करुणा से युक्त ही तथागत धातु या ज्ञान होता है।
इन बुद्ध के पूर्वोक्त तीन गुण के तीन स्वभाव भी हैं। वे हैं प्रभाव, अनन्यथा भाव एवं स्निग्ध भाव। इन तीनों के स्वभाव भी क्रमशः चिन्तामणि (रत्न), आकाश तथा (स्वच्छ) जल के तरह ही हैं।
चार प्रकार के आवरण, धर्मप्रतिघा, आत्मदर्शन, संसार दुःख की भीरुता, निरपेक्षता - प्राणियों के लिए।
इच्छाओं से भरे हुए तीर्थिकों के लिए तथा स्वयंभू श्रावकों के लिए अधिमुक्ति आदि चार धर्म शुद्धि के लिए बताए गए हैं।
जिनका बीज ही अग्रयान के प्राप्ति का साधन है। जिनकी माता बुद्ध धर्म को पैदा करने वाली प्रज्ञा है। ध्यान का सुख ही गर्भ स्थानीय स्थिति हैं, और वह कृपा ही है जो धात्री स्थानीय है जिसके पुत्र उनके धर्म ज्ञान तथा संघ ही हैं - वे मुनियों के पुत्र रूप में जन्म लेते हैं।
शुभात्मा, नित्यसुख, पारमिता ही इनके फल हैं। जो दुःख का नाशक छन्द के अप्राप्ति लक्षणात्मक धर्म ही है।
पूर्व श्लोक के आधे भाग से क्या बताया गया है। इनका फल, संक्षेप में धर्मकाय में विपर्यय से तथा चार प्रकार के विर्ययों के प्रतिपक्ष से प्रभावित है।
वह धर्मकाय प्रकृति शुद्ध होने से, वासना रहित होने से भी पवित्र है। परमात्मा, आत्मा, नैरात्म्य के प्रपञ्च से दूर होने से और शान्ति के कारण भी शुद्ध है।
वह सुख स्वरूप है क्योंकि मनोमय, स्कन्ध धातु आदि के निवृत्ति से तथा नित्य भी है क्योंकि संसार और निर्वाण में समत्व बुद्धि होने से भी।
अपनी प्रज्ञा द्वारा स्नेहपाश को काटकर अपने में ही समस्त सत्त्वों के स्नेह को समझकर महाकृपा से वह निर्वाण में नहीं जाता है। ऐसा जानकर प्रज्ञा और करुणा से बोधि के प्राप्ति से भी संसार और निर्वाण दोनों में आर्य नहीं जाता है।
यदि वह बुद्ध धातु न होता तो दुःख का निवारण भी नहीं होता। दुःख के नाश की इच्छा और उसके लिए प्रार्थना भी नहीं होती और निर्वाण की कामना (प्रार्थना-संकल्प) भी नहीं होती।
संसार से मुक्‍त होने की कामना का बीज संसार के दुःखों का अनुभव और दु:खमयता का बोध। यह तभी होगा जब महायान गोत्र में साधक स्थिर है किन्तु अगोत्रो के लिए यह संभव नहीं है।
महोदधि (समुद्र) के तरह ही अनन्त गुण रत्नों का अक्षय खानि है तथा दीप के तरह ही अन्धकार रहित गुणों के स्वभाव से सम्पन्न भी है यह योग।
धर्मकाय और जिनकायों में करुणा धातु के संग्रह होने से पात्र, रत्न और जलों के कारण समुद्र के साथ समानता यहाँ दिखाया गया है।
अभिज्ञा, ज्ञान की विमलता और तथता के व्यतिरेक से दीप का आलोक उसकी उष्णता, तेजस्वी वर्ण का साधर्म्य उस परिशुद्धता के साथ है।
पृथग्जन, आर्यजन, संबुद्ध-बोधिसत्त्व और बुद्ध के तथता को लेकर ही प्राणियों में इस बुद्ध गर्भ का तत्त्वदर्शियाँ ने उपदेश किया है।
सामान्य लोग विपर्यस्त (भ्रमित) होते हैं, क्योंकि वे सत्य को उलटे रूप में देखते हैं; परन्तु तथागत निष्प्रपंच होकर वस्तुओं को यथार्थ रूप में, बिना विपर्यय के देखते हैं।
अशुद्ध, अशुद्धशुद्ध तथा सुविशुद्ध क्रमशः सत्त्व धातु को जाना चाहिए जो बोधिसत्त्व तथागत रूप में हैं।
स्वभाव आदि ६ अर्थों के द्वारा संक्षेप में तीन धातुओं की अवस्था में तीन नामों से जाना गया है।
सर्वव्यापक, निर्विकल्परूप है जैसा की आकाश। चित्त प्रकृति से ही निर्मल है इसी से वह धातु है और व्यापक भी है।
उनके दोष और गुणों के प्रति निष्ठा जो सर्वत्र सामान्य रूप से उपलब्ध है। हीन, मध्य और विशिष्ट सत्त्वो या गुणों में जैसा कि आकाश होता है। बड़े स्थान में बड़ा, छोटे में छोटा मध्यम में मध्य है उसी प्रकार समझना चाहिए।
आगन्तुक मलों से ही दोष होते हैं जो गुण प्रकृति के योग से ही होते हैं। जैसा पहले था वैसा ही बाद में भी होगा - वह अविकारित्व धर्म ही है।
सूक्ष्म एवं व्यापक होते हुए भी आकाश कहीं भी लिप्त नहीं होता उसकी प्रकार यह बुद्ध गुण (धातु) भी कहीं भी लिप्त नहीं होता।
जैसा कि सभी संसार के लिए आकाश का उदय और व्यय होता है उसी प्रकार असंस्कृत धातु में इन्द्रियों का व्यय और उदय देखा गया है।
जैसा कि अग्नि से कभी भी आकाश जलता नहीं हैं उसी प्रकार इस बोधि का जन्म, जरा और मृत्यु नहीं होते।
पृथिवी जल में, जल वायु में, वायु आकाश में प्रतिष्ठित होते हैं किन्तु आकाश वायु, जल और पृथिवी में प्रतिष्ठित नहीं है।
स्कन्ध, धातु और इन्द्रियाँ कर्म और क्लेशों पर आधारित हैं; और कर्म तथा क्लेश सदा अयुक्त (अविवेकी) मनोविचार पर आधारित रहते हैं।
अयोनिशमनस्कार चित्तशुद्धि में प्रतिष्ठित है। सभी धर्मो में चित्त की निर्मलता प्रतिष्ठित है।
स्कन्ध, धातु और आयतनों को पृथिवी धातु के समान जानना चाहिए। शरीर धारियों के कर्मक्लेश जल के समान होते हैं।
अयोनिशमनस्कार को वायु धातु के तरह ही जानना चाहिए। अन्य प्रतिष्ठान उससे अप्रतिष्ठित होते हैं जैसे प्रकृति रूप से ही व्योम धातु के तरह।
प्रकृति में विलीन चित्त का अयोनिश मनस्कार मन की ही कृति है। क्लेश और कर्म अयोनिश मनस्कार से होते हैं।
कर्म क्लेश रूपी जल से उद्भूत स्कन्ध, धातु और अथतन हैं। जो उत्पन्न होते हैं, निरुद्ध होते हैं जैसे की संवर्त और विवर्त के (सुवर्ण) तरह।
न हेतु है, न सामग्री, न उत्पत्ति और न व्यय ही है - चित्त की, वह तो प्रकृति से ही सदा एक रस आकाश धातु के तरह ही है।
चित्त की जो प्रकृति प्रभास्वर स्थिति है वह कभी भी विकृत नहीं होती और आकाश के तरह ही रहती है। आगन्तुक राग-मल आदि से कभी भी व्यापृत न होने से संक्लेश अभूत कलपात्मक तत्त्वों से सदा दूर रहता है।
इसे कर्मक्लेशों का संचय कभी भी छू तक नहीं सकता और मृत्यु, व्याधि, जरा रूप अनल (अग्नि) इसे कभी जला नहीं सकता।
युग के अन्तिम में तीन अग्नि हैं। वे है - अग्नि, नारक (अग्नि) और प्राकृत (अग्नि) हैं। इन तीनों के तीन उपमायें हैं - मृत्यु, व्याधि और जरा।
मुक्त होने के कारण रोग व्याधि जरा आदि से विमुक्त हैं। इस प्रकृति को यथार्थ रूप में जानने के कारण जन्म आदि व्यसन और मृत्यु होने पर भी उसके मूल कारण को जानने वाले बुद्धिमान्‌ लोग जगत में कृपा के कारण संसार पर कल्याण की वर्षा करते हैं।
मृत्यु, व्याधि, जरा और दुःखों के मूलों को उखाड़ दिया है आयौँ ने, अतः कर्म, क्लेश के कारण जन्म ही नहीं होगा तब उसके अभाव से उनमें अन्य मृत्यु आदि भी नहीं होगे।
कारुणिक महात्मा तथागत जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि को दिखाते हैं क्योंकि वे यथार्थ तत्त्व को जानने के कारण जन्म मृत्यु आदि से सर्वदा के लिए मुक्त हैं।
जिनात्मज बोधिसत्त्व अविकार धर्मता का विवेचन करके, अविद्याअन्धो के द्वारा जाति-जन्म आदि का साक्षात्कार किया जाता है वह बोधिसत्त्वो के लिए अत्यन्त आश्‍चर्यकारक है॥
अत एव जगत्‌ के बन्धुभूत बोधिसत्त्व के दो तत्त्व हैं, उपाय और करुणा जो आर्यो के द्वारा साक्षात्कार किया जाता है, जिसे बच्चों के साक्षात्कार में आर्य देखते हैं।
यह सभी लोकों से दूर है किन्तु लोक से निकला हुआ भी नहीं है। लोक के लिए लोक में ही विचरण करते हैं किन्तु लौकिकमल से लिप्त भी नहीं होते।
जैसे जल में ही पैदा होकर जल में ही रहने वाले कमलपत्र जल में लिप्त नहीं होते उसी प्रकार लोक में पैदा होकर लोक में रहते हुए भी वे उसमें लिप्त नहीं होते।
वे बोधिसत्त्व नित्य उज्जवल बुद्धि सम्पन्न होते हैं तथा अग्नि के तरह ही काम भी करते हैं। शान्त ध्यान समापत्ति में हमेशा लगे रहते हैं।
पूर्वकृत पुण्य कर्म के कारण सभी विकल्प इनके तिरोहित हो जाते हैं अतः फिर शरीर के परिपाक के लिए कोई शुभ या अशुभ कर्म नहीं करते।
जो सत्त्व जिस उपाय से अनुशासित होता है उसी उपाय से उसे मुक्ति के मार्ग में ले जाते हैं और अपने रूप और शरीर से उसके लिए उपदेश, चर्या या ईर्यापथ के द्वारा अपना काम करते हैं।
हमेशा अनाभोग के द्वारा सर्वदा अपने तीव्र बुद्धि युक्त वे संसार में आकाश पर्यन्त प्राणियों के कल्याणार्थ लगे ही रहते हैं।
इस प्रकार के गति से सम्पन्न बोधिसत्त्व तथागत के समान ही हो जाते हैं क्योंकि प्राणियों के कल्याण के लिए ही यह सब हुआ करता है।
इनमें, बोधिसत्त्व और तथागतों में इतना ही भेद है - तथागत पृथिवी हैं तो बोधिसत्त्व उसका परमाणु और तथागत समुद्र स्थानीय हैं तो बोधिसत्त्व गाय के खुर के जल के समान।
आत्मक्षय के योग से यथार्थ तत्त्व को समझने वाले तथा जगत्‌ के ही शरण्य हैं क्योंकि आदि और अन्त न होने से, विकल्पविहीन होने से सर्वदा अद्वयरूप हैं, अविनाशी होने पर भी निर्मित स्वभाव वाले नहीं है।
वे पैदा नहीं होते, न ही मरते, न बाधित होते और न वृद्ध होते हैं। नित्य और ध्रुव होने से तथा शिव और शाश्वत होने से भी।
नित्य होने से पैदा नहीं होते, मनोमय आत्म भाव के कारण अचिन्त्य परिणाम युक्त भी हैं और ध्रुव होने से मरते भी नहीं हैं।
शिवत्व होने से सूक्ष्म वासना रूप व्याधियों से बाधित नहीं होते। शाश्वत होने से अनास्रव अभिसंस्कारों से भी बुद्धत्व को प्राप्त नहीं होते।
यहाँ पर दो से, फिर दो से, क्रमश: दो और दो पदों से भी नित्यता आदि अर्थ असंस्कृत पद में जानना चाहिए।
वह धर्मकाय है, वही तथागत भी है क्योंकि वही आर्यसत्य है जहाँ परमार्थ का प्रकटीकरण होता है। अतः बुद्धत्व के बिना, जैसे सूर्य के बिना प्रकाश प्रकट नहीं होता, उसी प्रकार गुणों का विभाग और उसके बाद परम विश्राम भी संभव नहीं है।
धर्मकाय आदि पर्याय संक्षेप में जानने चाहिए। चार अनास्त्रव धातु में हैं चार अर्थ के भेद से बोध्य हैं।
बुद्ध धर्मो का अविनिर्भाग, बुद्ध गोत्र का आगम, अमृषामोषधर्मित्व तथा आदि प्रकृति शान्तता चार ही हैं।
सर्वाकाराभिसम्बोधि, वासनासहितमल का विनाश, बुद्धत्व और निर्वाण पारमार्थिक रूप में अद्वय ही है।
कुछ एक दूसरे से बढ़कर चित्र बनाने वाले कलाकार थे। एक कलाकार किसी एक अङ्ग को बना सकता था किन्तु दूसरे का नहीं। इसी प्रकार सभी कलाकार दूसरे के बनाए हुए चित्राङ्ग को नहीं लेते थे। या नहीं बनाते, या नहीं जानते थे।
इसी क्रम में उनके मालिक राजा ने सभी चित्रकारों को आज्ञा दी कि सब आप मिलकर मेरा चित्र बनायें।
प्रभु की आज्ञा से वे सब चित्रकार अपने अपने हिस्सों का चित्र बनाने लगे। परन्तु बीच में ही एक चित्रकार किसी कारणवश अन्यत्र चला गया।
अत: वह चित्र राजा का जिसे सब मिलकर बना रहे थे पूर्ण नहीं हुआ किन्तु अपूर्ण एवं विकृत ही हुआ।
यही यहाँ उपमा दी गई है। यहाँ जो लेखक हैं वे तदाकार दान-शील-क्षमा आदि पारमिता है। वह प्रतिमा जिसका निर्माण किया जा रहा था वह सर्वाकारवरोपेत शून्यता ही है।
प्रज्ञा, ज्ञान और विमुक्तियों का, दीप्ति, स्फरण, शुद्धि और अभेदों से प्रभा, रश्मि और सूर्य-मण्डल से साधर्म्य है।
अतः बुद्धत्व को बिना जाने निर्वाण की प्राप्ति संभव नहीं है। सूर्य के प्रभा रश्मि को हटाकर सूर्य को नहीं देखा जा सकता है।
इस प्रकार जिन के गर्भ का व्यवस्थापन दश प्रकार से होता है यह कहा गया है। उनके क्लेश और कोश गर्भ को फिर उनके निर्देशन से ही फिर जानना चाहिए।
कुपद्म में बुद्ध, मक्षिकाओं में मधु, तुषा में अन्नों का सार, अशुचि में सुवर्ण, निधि पृथिवी में, अल्पफल में अङ्कुर आदि, इसी प्रकार भिगे हुए वस्त्रो में जिनों का आत्मभाव रहता है।
नारी के पेट (तुच्छ) में राजा, मिट्टी में रत्नों का बिम्ब तथा आगन्तुक क्लेश मलों में आवृत प्राणियों में यह तथागत धातु स्थित है।
कुत्सित पद्मकोश के सदृश क्लेश हैं, तथागत धातु बुद्ध के तरह ही है।
जैसे सुखे हुए पत्तों से कमल पुष्प ढका हुआ होता है। उसी प्रकार तथागत भी हजारों तेजस्वी तेज से ढके हुए हैं। मनुष्य को अमल दीव्य लोचन होकर समीक्षा करके कमल के पत्तों से उसे बाहर निकालना चाहिए।
इसी प्रकार सुगत (बुद्ध) अपनी बुद्ध-दृष्टि से, अवीचि नरक में स्थित प्राणियों में भी अपने ही धर्मस्वभाव को देखते हैं; और करुणा से प्रेरित होकर, स्वयं आवरणों से रहित होते हुए, उन्हें उन आवरणों से मुक्त करते हैं।
यद्यपि यह हो सकता है कि कोई कमल पुष्प जुगुप्सित ही हो फिर भी दिव्य दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति उसके अन्तःस्थल में छिपे हुए अच्छे पत्रों को देखे और उन्हें अपने लिए ले आए। इसी प्रकार प्रत्येक शरीर के भीतर राग, द्वेष, मल आदि कोष अवश्य विद्यमान रहते हैं किन्तु करुणापूर्ण दृष्टियुक्त होकर उसके अन्दर अवस्थित विशुद्ध चित्त को देखकर उसे अपनाए। वैसा ही मुनि, भगवान्‌ तथागत करते हैं।
जैसे मधु विभिन्न वस्तुओं के अन्तस्तल पर छिपा हुआ होता है उसी प्रकार विद्वान्‌ पुरुष इस रहस्य को समझ कर चारों ओर खोजकर अपने आवश्यक मधु का संचय करें। उसके लिए उपायों का अन्वेषण करें।
वह महर्षि जो सर्वज्ञरूप नेत्र को धारण किए हुए हैं। वह मधु भी तथागत धातु ही है। उसे देखकर, उसके चारों ओर मंडराते भ्रमर समूहों को हटाकर वह मधु अपने लिए सञ्चित करते हैं।
जैसे हजारों मधुमक्षिकाओं से मधु का छत्ता घिरा रहता है, किन्तु मधु को चाहने वाला पुरुष उन सभी को भगाकर-मारकर अपने लिए उस मधु को ले ही लेता है उसी प्रकार अनन्त कामनों के द्वारा घिरे हुए अपने आप को देखकर तथा उसके भीतर के ज्ञान राशि (मधु) को पता लगाकर सबसे पहले उन कामनाओं को हटाकर मारकर उस मधु ज्ञान को ले लेता है वही विद्वान्‌ है। वही बुद्धिमान्‌ और जिन भी है।
धान्यों के बाहर भूषा रहता है, जब तक उसे अलग नहीं किया जाता तब तक उस चामल (सार) को ग्रहण नहीं किया जा सकता अतः जो अन्नार्थी हैं सबसे पहले तुष-भूषा को अलग करते हैं।
इसी प्रकार प्राणियों में भी क्लेशमलों से ज्ञान ढका हुआ होता है जब तक उन क्लेशों को दूर न किया जाय तब तक जिनत्व-तथागत धातु-ज्ञान प्रकट नहीं होता। अतः विद्वान्‌ वर्ग त्रिभव में क्लेशमलों को दूर करने के बाद ही संसार से मुक्त होते हैं।
जब तब इस संसार में, जब तक कङ्गु, शाली, कोद्रव और धानों के भूषा का अंत करके उनके अन्दर में रह रहे अत्यन्त सुन्दर सार चावल आदि को सुसंस्कृत नहीं किया जाता तब तक वह भोजन स्वादपूर्ण नहीं हो सकता। उसी प्रकार क्लेश रूपी तुष-भूषा से ढके हुए अन्तःस्थित प्रीतिपूर्ण धर्म को नहीं निकाला जाता तब तक धर्म प्रीति रस उपलब्ध नहीं होता जिससे क्लेश क्षुधा की शान्ति भी नहीं होती।
कोई व्यक्ति सुवर्ण लेकर कहीं जा रहा है, उसे पता नहीं चला और उसका वह बहुमूल्य सुवर्ण अत्यन्त अपवित्र जगह में गिर गया और हजारों वर्षो तक पडा ही रहा किन्तु उसमें कोई विकार नहीं आया।
कोई दिव्य दृष्टि सम्पन्न देवता ने यह देखकर किसी व्यक्ति से कहा देखो वहाँ पर, उस अशुद्ध जगह में सुवर्ण पड़ा है तुम ले लो और अपना कार्य करो, जो नवरत्नो में अग्रस्थानीय है।
इसी प्रकार तथागत ने समग्र प्राणियों में भीतर रह रहे सत्त्व गुण को देखा जो अनेक अशुद्ध क्लेशों के भीतर है, उसे उठाकर, धर्मवर्षा से पवित्र कर जनता को वितरित किया।
जैसे की गाय के गोबर में फॅसे हुए अनेक धान आदि अन्नों को देखकर कोई देवता मुनिगणों को यह बताता है कि देखो वहाँ पर अन्न है आप लोग उसे लेकर शुद्ध करो और उससे अपना कार्य करो। इसी प्रकार महान्‌ अशुद्ध मलों में पतित बुद्ध रत्न को देखकर भगवान्‌ तथागत उन जनों को उपदेश देते है उसे शुद्ध कर अनेक कार्यों को करने के लिए।
जैसे किसी अत्यन्त दरिद्र व्यक्ति के घर के भीतर अक्षय धन गढ़ा हुआ हो किन्तु वह घर धनी नहीं जानता और वह बहुमूल्य धन भी यह नहीं बताता की मैं यहाँ हूँ।
उसी प्रकार मन के अन्दर अचिन्त्य रूप से रह रहे अक्षय धर्म हैं किन्तु वह अनेक कोषों से ढका हुआ है किन्तु बह व्यक्ति (मन) नहीं जानता वह अक्षय धर्म भी कुछ कहता नहीं अतः वह दारिद्र्य दुःख वैसा ही रहता है।
जैसे अति दरिद्र व्यक्ति के घर के भीतर गढा हुआ रत्न समूह कुछ नहीं कहता कि - मैं यहाँ गढा हूँ, और वह व्यक्ति नहीं जान सकता। वैसे ही वह गढा हुआ निधि धर्म है दद्रिता गृहपति समस्त प्राणी हैं, किन्तु उस गृहपति को सत्त्वों को वह धन - धर्म को दिखाने वाले दिव्यदृष्टि सम्पन्न मुनि बुद्ध पुरुष आते हैं।
जैसे आम, ताल आदि वृक्षों में बीज ओर उसमें अविनाशी (सुन्दर) अङ्कर लगते हैं - पृथिवी में, जल मल आदि के सहयोग द्वारा। क्रमश: वह बीजाङ्कर विशाल वृक्ष बन जाता है।
जल, सूर्य के किरण, पृथिवी और समय के कारणों से एक नन्हा सा बीज - जो आम, ताल आदि वृक्षों का है, वह क्रमश: बड़ा होकर विशालकाय वृक्ष बन जाता है। उसी प्रकार प्राणियों के अन्दर अविद्या कोश से ढका हुआ संबुद्धत्व का बीज क्रमशः शुभ कारणों के आ जाने पर अङ्कुर होते हुए विशिष्ट धर्म वृक्ष बन जाता है।
रत्नों से बनी हुई भगवान्‌ तथागत की मूर्ति है। वह बहुमूल्य तथा शूद्ध है किन्तु किसी ने उसके “ऊपर अत्यन्त दुर्गन्धित वस्त्र रख दिया या ढक दिया हो। उसे किसी देवता ने देखा और कहा की यह रत्नों की मूर्ति है। तब लोगों ने उस वस्त्र को हटा दिया तब पता चला कि कितनी सुन्दर, पवित्र मूर्ति है।
इसी प्रकार अनेक क्लेश मलों से आवृत सुगतात्म भाव को, किसी असङ्ग एवं दिव्य चक्षु सम्पन्न व्यक्ति ने, देखकर पशु प्राण आदि समस्त संसार को और उन्हें मुक्ति के उपाय को बताते हैं।
जैसे रत्नों से बनी हुई तथागत की मूर्ति को किसी अपवित्र कपड़े से लपेटकर रास्ते में फ़ैंक दी गई हो, उसे किसी दिव्य दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति ने मनुष्यों को दिखा दिया कि देखो यह रत्नमयी तथागत मूर्ति है तब उसे लोगों ने मुक्त किया। उसी प्रकार क्लेश रूपी अपवित्र वस्त्रों से ढक कर संसार रूपी मार्ग में फेंके हुए तथागत धातु को देखकर तथागत ने उनकी मुक्ति के लिए धर्म का उपदेश दिया।
कोई महिला है जो अनाथ हो गई है और किसी अनाथालय में रहती है। अत्यन्त विरूप हो गई है और वह ऊपर से गर्भवती भी है। किन्तु उसके गर्भ में जो बच्चा है वह भावी चक्रवर्ती राजा है किन्तु वह उस राजत्व को नहीं जानती।
अनाथालय के तरह ही यह संसार है। गर्भिणी स्त्री के सदृश प्राणी, जो अशुद्ध हैं। गर्भ में स्थित राजा के तरह विशुद्ध धर्मधातु है, जिसके होने से वे सनाथ हो जाते हैं।
जैसे कोई स्त्री मलिन वस्त्रों से ढकी हो, कुरूप हो, अनाथालय में हो, दुःखी हो किन्तु वह नहीं जानती उसके गर्भ में राजा है। उसी प्रकार क्लेशो के कारण अशान्त चित्त वाले दुःखालय में अवस्थित जनता अपने अन्दर स्थित नाथ धर्म धातु के होते हुए भी दुःखी हैं यह नहीं जानते कि उनके भीतर क्या है।
कोई मूर्ति है बाहर से मिट्टी दिखती है किन्तु वह मूर्ति तो पूर्ण रूप से सुवर्ण से बनी हुई है, को जानकार उसे देखकर बताता है कि यह लेप केवल बाहर मिट्टी का है भीतर तो सुवर्ण है।
मलों की आगन्तुक प्रवृत्ति और अन्दर प्रकृति से ही प्रभास्वर तथागतधातु है। इसे देखकर जगत्‌ के अग्रबोधिसत्त्व इन मलावरणों से सत्त्वो को परिशोधित करते हैं।
जैसे मिट्टी के भीतर छिपी हुई निर्मल और तेजस्वी स्वर्णमयी मूर्ति को जानकर रत्नों का ज्ञाता कारीगर मिट्टी को हटाता है; उसी प्रकार सर्वज्ञ बुद्ध, मन के भीतर स्थित शुद्ध स्वर्ण के समान शांत तत्त्व को जानकर, धर्मोपदेश और विभिन्न उपायों के प्रहार से उसके ऊपर के आवरणों को दूर करते हैं।
इसी प्रकार अनेक क्लेश मलों से आवृत सुगतात्म भाव को, किसी असङ्ग एवं दिव्य चक्षु सम्पन्न व्यक्ति ने, देखकर पशु प्राण आदि समस्त संसार को और उन्हें मुक्ति के उपाय को बताते हैं।
जैसे निर्मल, दीप्त काञ्चनमयी बिम्ब को बाहर से मृत्तिका के लेप को देखकर रत्नकुशल जौहर मृत्तिका को हटाकर उसे दिखाता है। उसी प्रकार शान्त, तेजस्वी मनरूपी तथागतधातु को धर्मरूपी आख्यान से शुद्धकर लोगों-सत्त्वों को कोई तथागत ही दिखाता है।
उदाहरणों के पिण्डार्थ। कमल, भ्रमर, प्राणिगण, भूषा, गन्दगी, पृथिवी, फलों के त्वक, गन्दा वस्त्र, स्त्रीगर्भ, मिट्टी का लेप आदि में
बुद्ध, मधु, अन्न, सुवर्ण, निधि (रत्न), वृक्ष, रत्नों की मूर्ति, चक्रवर्ती राजा, सुवर्ण की मूर्ति के तरह ही सत्त्व धातुओं का असम्बद्ध क्लेश शोश जो अनादि हैं में,
प्रकृति से ही निर्मल चित्त का निवास हुआ करता है यह अनादिकाल से है यही उदाहरण उपर्युक्त श्लोकों में दिया गया है।
राग, द्वेष, मोह, तीव्र चारों ओर से घिरे हुए वासनागण, दृष्टि, मार्ग, भावना, अशुद्ध, शुद्ध भूमि में स्थित मलगण,
पद्मकोश आदि दृष्टान्तों से ६ प्रकार से बताए गए हैं अपर्यन्त, उपक्लेश और कोश वृद्धि आदि भेदपूर्वक सविस्तार प्रकाशित हैं उन्हें जानना चाहिए।
नौ प्रकार के राग आदि क्लेश संक्षेप में, क्रमश: नौ प्रकार के कोश आदि दृष्टान्तों के द्वारा प्रकाशित किए गए हैं।
इन चार प्रकार के मलों से बालकों का, अर्हतों का, शैक्ष और बुद्धिमानों का क्रमशः एक से या दो-दो से अशुद्धि होती है।
वह कमल अत्यन्त सुकोमल है जो उसके जन्मकाल में सुन्दर था किन्तु बाद में वह कुरुप हो गया जैसे की रागी व्यक्ति का चित्त के अन्त में होता है।
अत्यन्त कुपित होकर (कभी कभी) मधुमक्खियाँ जैसे लोगों को काटती हैं उसी प्रकार हदय में स्थित होकर द्वेष दुःख पैदा करता है।
चावलों को जैसे बाह्य तुष ढक देते हैं उसी प्रकार मोह रूपी कोशों से अन्तस्थित सार ढके हुए होते हैं।
कामी पुरुषों के लिए जैसे अमेध्य (अपवित्र) पदार्थ प्रतिकूल होते हैं वैसे ही वैराग्यवान्‌ लोगों के लिए काम हैं। काम वासना पूर्ति के लिए वे अमेध्य (अपवित्र) हो जाते हैं वैराग्य के स्थिति में।
पृथिवी के अन्दर छिपे हुए बहुमूल्य धातु अज्ञान के कारण प्राप्त नहीं होते उसी प्रकार अन्दर में स्वयंभू के रूप में स्थित तथता भी अविद्यावासना भूमि में छिपे होने से उपलब्ध नहीं होते।
जैसे बीज, फिर उसका फूटना, फिर अङ्कुर क्रमशः होते हैं उसी प्रकार जो हेय पदार्थ हैं क्रमशः तत्त्व दर्शन से निष्प्राण हो जाते हैं।
शरीर को सत्य समझने वाले लोगों का जो अन्तःसार ढका हुआ है, आर्य के उपदेशों से क्रमश: ज्ञान उत्पन्न होने से ढका हुआ तत्त्व प्रकट होता है जैसे - गन्दे वस्त्र से ढकी हुई मूर्ति।
गर्भ, कोश और मल के दृष्टान्त से सप्तभूमि में अवस्थित मलों का निदर्शन है। कोश का विपाटन, गर्भ का बाहर आना, और ज्ञान प्राप्त करने के तरह विकल्प समाप्त होते हैं। जैसे कि विपाक।
मिट्टी-पङ्क (कीचड़) के लेपन के तरह ही स्त्री और भूमि में स्थित राज और निधि को जानना चाहिए। जो मल हैं वे वज्रोपमा से समाधान होते हैं और ज्ञान से वध्य होते हैं महात्माओं के लिए।
इसी प्रकार पद्म आदि के समान, राग आदि मलों को जानना चाहिए। बुद्ध धातु के समान ही तीन स्वभावों के संग्रह से वे मल समाप्त होते हैं।
धर्मकाय स्वभाव, तथता और गोत्र वे तीन स्वभाव हैं। तीनों से और एक से वह जाना जाता है और ५ निदर्शनों के सहयोग से।
धर्मकाय दो प्रकार का माना गया है—एक है अत्यन्त निर्मल धर्मधातु, और दूसरा है उससे प्रवाहित होने वाली गम्भीर तथा विविध उपायों से युक्त धर्म की देशना।
इस संसार से ऊपर होने से इस लोक में कोई दृष्टान्त उपलब्ध नहीं है अतः धातु (धर्मधातु) का दृष्टान्त तथागत को ही बनाया गया है।
प्रकृति से ही अविकारी होने से, कल्याणात्मक होने से तथा विशुद्ध होने से भी सुवर्ण के मण्डल (राशि) के तरह ही तथता को बताया गया है।
वह तथागत गोत्र भी दो प्रकार का है निधान (खानी) और फल वृक्ष के तरह ही, जो अनादि प्रकृति में स्थित और बाद में बाहर आया हुआ।
तीन बुद्धकायों की प्राप्ति इसी गोत्र से होती है जो अद्वय काय है। प्रथम से प्रथम काय द्वितीय से दूसरा काय और तीसरे से तीसरा काय।
रत्नों से निर्मित प्रतिमाओं के तरह यह काय शुभ और स्वाभाविक होता है। क्यों? अकृत्रिम, प्राकृत तथा रत्नों के गुण होने से।
महाधर्माधिराजरूप यह काय है - सम्भोग काय। चक्रवर्ती राजा के तरह। प्रतिबिम्ब स्वभाव होने से निर्माण काय सुवर्ण राशि के तरह ही है।
स्वयंभूबुद्धों की तथता, धर्मधातु आदि के विषय में श्रद्धा द्वारा ही जानने का प्रयत्न करना चाहिए। क्योंकि कोई आँख विहीन व्यक्ति सुदीप सूर्य के प्रभामण्डल को नहीं देख सकता।
यहाँ कुछ भी त्याज्य नहीं है और न ही ग्राह्य है। यथार्थ को यथार्थ दृष्टि से देखना चाहिए। ऐसा यथार्थ दर्शी ही मुक्त होता है।
तथागत धातु आगन्तुक सविनिर्भाग लक्षणात्मक मलों से शून्य है। अनुत्तर धर्मों से जो अविनिर्भाग लक्षणात्म हैं, उनसे अशून्य (युक्त) तथागत धातु है।
सब कुछ शून्य है। सर्वथा यत्र तत्र शून्य ही है। उसे मेघ, स्वप्न और माया के तरह ही जानना चाहिए। ऐसा कहा है फिर बुद्ध धातु सभी सत्त्वो में अवस्थित है यह क्यों कहा गया है।
हीन प्राणियों में चित्त (अहं मम) लीन होने से, हीन सत्त्वो की अवज्ञा होने से, भूत ग्राह होने से, भूत धर्मो में अपवाद और अधिक आत्मस्नेह - ये पाँच दोष होने से वे शून्यता से दूर हैं यह कहा गया है।
भूत कोटियों में सभी प्रकार के संस्कृत धर्मो का विवेचन किया जा चुका है। वे सब क्लेश-कर्म-विपाक के लिए हैं और मेघ आदि के तरह ही उदाहृत किया गया है।
क्लेश मेघोपम हैँ, कृत्य क्रिया स्वप्न के भोगों के तरह हैं। स्कन्ध जादू जैसे हैं जो क्लेश कर्मों के ही फल हैं।
पहले ही सब कुछ व्यवस्थित करके इस उत्तर तन्त्र में पाँच दोषों के प्रहाण के लिए धातु के अस्तित्त्व को प्रकाशित किया गया है।
इसके अश्रवण के कारण बोधि में चित्त व्यवस्थित नहीं होता है। कुछ नीच चित्त युक्त व्यक्तियों के लिए आत्मा के अब ज्ञान दोषों के कारण
बोधिचित्त के उदय होने पर भी मैं श्रेष्ठ हूँ इस अहं के कारण बोधि अनुत्पन्नो के प्रति हीन संज्ञा उत्पन्न होती है।
ऐसे बुद्धि वालों को सम्यक्‌ ज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती अतः अभूत का ग्रहण और भूत का अग्रहण होता है।
अभूत ही सत्त्वों के दोष हैं, क्योंकि कृत्रिम आगन्तुक मलों के कारण और भूत उनके लिए दोष भी है जो नैरात्म्य है और शुद्धि प्रकृति के गुण हैं।
असत्‌ दोषों का ग्रहण, यथार्थ को ग्रहण करना और उनकी निन्दा करना इस प्रकार सत्त्व अपने समदर्शी सत्त्वों का मैत्री भी प्राप्त नहीं कर सकते।
इस उपर्युक्त वक्तव्य से शास्त्र के गौरव के प्रति उत्साह का वर्धन होगा और प्रज्ञा, ज्ञान और मैत्री की प्राप्ति होगी पाँच धर्मों के उदय के कारण।
इसके बाद वह सत्त्व समदर्शी होगा, निर्दोष होगा, गुणवान् होगा। अपने समान प्राणियों में स्नेह भाव रखेगा इस प्रकार अति शीघ्रता से वह बुद्धत्व प्राप्त करेगा।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें