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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 104
यद्वत्‌ प्राणिसहस्त्रकोटिनियुतैर्मध्वावृतं स्यान्नरो मध्वर्थी विनिहत्य तान्मधुकरान्मध्वा यथाकामतः। कुर्यात्कार्यमनास्त्रवं मधुनिभं ज्ञानं तथा देहिषु क्लेशाः क्षुद्रनिभा जिनः पुरुषवत्‌ तदघातने कोविद:॥
जैसे हजारों मधुमक्षिकाओं से मधु का छत्ता घिरा रहता है, किन्तु मधु को चाहने वाला पुरुष उन सभी को भगाकर-मारकर अपने लिए उस मधु को ले ही लेता है उसी प्रकार अनन्त कामनों के द्वारा घिरे हुए अपने आप को देखकर तथा उसके भीतर के ज्ञान राशि (मधु) को पता लगाकर सबसे पहले उन कामनाओं को हटाकर मारकर उस मधु ज्ञान को ले लेता है वही विद्वान्‌ है। वही बुद्धिमान्‌ और जिन भी है।
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