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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 115
यथाम्रतालादिफले द्रुमाणां बीजाङ्कुरः सन्नविनाशधर्मी। उप्तः पृथिव्यां सलिलादियोगात्‌ क्रमादुपैति द्रुमराजभावम्‌॥
जैसे आम, ताल आदि वृक्षों में बीज ओर उसमें अविनाशी (सुन्दर) अङ्कर लगते हैं - पृथिवी में, जल मल आदि के सहयोग द्वारा। क्रमश: वह बीजाङ्कर विशाल वृक्ष बन जाता है।
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