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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 40
बुद्धधातुः सचेन्न स्यान्निर्विददुःखेऽपि नो भवेत्‌। नेच्छा न प्रार्थना नापि प्रणिधिर्निर्वृतौ भवेत्‌॥
यदि वह बुद्ध धातु न होता तो दुःख का निवारण भी नहीं होता। दुःख के नाश की इच्छा और उसके लिए प्रार्थना भी नहीं होती और निर्वाण की कामना (प्रार्थना-संकल्प) भी नहीं होती।
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