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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 119
यद्वद्रत्नमयं तथागतवपुर्दुर्गन्धवस्त्रावृतं वर्त्मन्युस्ज्ञितमेक्ष्य दिव्यनयनो मुक्त्यै नृणां दर्शयेत्‌। तद्वत्‌ क्लेशविपूतिवस्त्रनिवृतं संसारवर्त्मोज्झितं तिर्यक्षु व्यवलोक्य धातुमवदद्धर्म विमुक्त्यै जिनः॥
जैसे रत्नों से बनी हुई तथागत की मूर्ति को किसी अपवित्र कपड़े से लपेटकर रास्ते में फ़ैंक दी गई हो, उसे किसी दिव्य दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति ने मनुष्यों को दिखा दिया कि देखो यह रत्नमयी तथागत मूर्ति है तब उसे लोगों ने मुक्त किया। उसी प्रकार क्लेश रूपी अपवित्र वस्त्रों से ढक कर संसार रूपी मार्ग में फेंके हुए तथागत धातु को देखकर तथागत ने उनकी मुक्ति के लिए धर्म का उपदेश दिया।
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