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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 99
यथा विवर्णाम्बुजगर्भवेष्टितं तथागतं दीप्तसहस्त्रलक्षणम्‌। नर: समीक्ष्यामलदिव्यलोचनो विमोचयेदम्बुजपत्तकोशत: ॥
जैसे सुखे हुए पत्तों से कमल पुष्प ढका हुआ होता है। उसी प्रकार तथागत भी हजारों तेजस्वी तेज से ढके हुए हैं। मनुष्य को अमल दीव्य लोचन होकर समीक्षा करके कमल के पत्तों से उसे बाहर निकालना चाहिए।
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