न हेतुः प्रत्ययो नापि न सामग्री न चोदयः। न व्ययो न स्थितिश्चित्तप्रकृतेर्व्योमधातुवत्॥
न हेतु है, न सामग्री, न उत्पत्ति और न व्यय ही है - चित्त की, वह तो प्रकृति से ही सदा एक रस आकाश धातु के तरह ही है।
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