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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 88
अन्योन्यकुशला यद्वद्भवेयुश्चित्रलेखकाः। यो यदङ्गं प्रजानीयात्तदन्यो नावधारयेत्‌॥
कुछ एक दूसरे से बढ़कर चित्र बनाने वाले कलाकार थे। एक कलाकार किसी एक अङ्ग को बना सकता था किन्तु दूसरे का नहीं। इसी प्रकार सभी कलाकार दूसरे के बनाए हुए चित्राङ्ग को नहीं लेते थे। या नहीं बनाते, या नहीं जानते थे।
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