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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 8
शक्तिर्ज्ञानकृपाभ्यां तु दुःखक्लेशनिबर्हणात्‌। त्रिभिराद्योर्गुणै: स्वार्थः परार्थः पश्चिमैस्त्रिभिः॥
ज्ञान और कृपा के द्वारा साथ ही दुःख और क्लेश के नाश से शक्ति की अवस्थिति होती है। उपर्युक्त आदि के तीन गुणों से स्वार्थ सम्पत्‌ (शक्ति) तथा परार्थ (शक्ति) अन्य तीन गुणों से घोषित होती है।
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