पूर्वावेधवशात् सर्वविकल्पापगमाच्च सः। न पुनः कुरूते यत्नं परिपाकाय देहिनाम्॥
पूर्वकृत पुण्य कर्म के कारण सभी विकल्प इनके तिरोहित हो जाते हैं अतः फिर शरीर के परिपाक के लिए कोई शुभ या अशुभ कर्म नहीं करते।
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