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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 122
यद्वत्‌ स्त्री मलिनाम्बरावृततनुर्बी भत्सरूपान्विता विन्देददुःखमनाथवेश्मनि परं गर्भान्तरस्थे नृपे। तद्वत्‌ क्लेशवशादशान्तमनसो दुःखालयस्था जनाः सन्नाथेषु च सत्स्वनाथमतय: स्वात्मान्तरस्थेष्वपि॥
जैसे कोई स्त्री मलिन वस्त्रों से ढकी हो, कुरूप हो, अनाथालय में हो, दुःखी हो किन्तु वह नहीं जानती उसके गर्भ में राजा है। उसी प्रकार क्लेशो के कारण अशान्त चित्त वाले दुःखालय में अवस्थित जनता अपने अन्दर स्थित नाथ धर्म धातु के होते हुए भी दुःखी हैं यह नहीं जानते कि उनके भीतर क्या है।
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