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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 5
असंस्कृतमनाभोगमपरप्रत्ययोदितम्‌। बुद्धत्वं ज्ञानकारुण्यशकत्युपेतं द्वयार्थवत्‌॥
बुद्धत्व में आठ गुण हैं। वे हैं - असंस्कृत, अनाभोग जो अपर प्रत्यय से उदित हुआ है। वही ज्ञान करुणा रूपी शक्ति से युक्त है दो अर्थो - सम्पत्तियों के तरह।
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