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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 18
ज्ञानदर्शनसंशुद्ध्या बुद्धज्ञानादनुत्तरात्‌। अवैवर्त्याद्‌ भवन्त्यार्याः शरणं सर्वदेहिनाम्‌॥
ज्ञान और दर्शन की पूर्ण शुद्धि तथा बुद्ध के अनुत्तर ज्ञान को प्राप्त करके, अवैवर्त्य (अडिग अवस्था) को प्राप्त आर्य पुरुष सभी देहधारियों के लिए शरण बन जाते हैं।
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