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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 101
यद्वत्‌ स्याद्विजुगुप्सितं जलरुहंसंमिञ्जितं दिव्यदूक्‌ तद्गर्भस्थितमभ्युदीक्ष्य सुगतं पत्राणि संछेदयेत्‌। रागद्वेषमलादिकोशनिवृतं संबुद्धगर्भ जगत्‌ कारुण्यादवलोक्य तन्निवरणं निर्हन्ति तद्वन्मुनि:॥
यद्यपि यह हो सकता है कि कोई कमल पुष्प जुगुप्सित ही हो फिर भी दिव्य दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति उसके अन्तःस्थल में छिपे हुए अच्छे पत्रों को देखे और उन्हें अपने लिए ले आए। इसी प्रकार प्रत्येक शरीर के भीतर राग, द्वेष, मल आदि कोष अवश्य विद्यमान रहते हैं किन्तु करुणापूर्ण दृष्टियुक्त होकर उसके अन्दर अवस्थित विशुद्ध चित्त को देखकर उसे अपनाए। वैसा ही मुनि, भगवान्‌ तथागत करते हैं।
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