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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 28
संबुद्धकायस्फरणात्‌ तथताव्यतिभेदतः। गोत्रतश्च सदा सर्वे बुद्धगर्भाः शरीरिणः॥
बुद्ध के ज्ञान के प्रकाश और तथता के अभेद तथा बुद्ध गोत्र होने से भी सभी शरीर धारी बुद्ध गर्भ के अन्तर्गत ही हैंl
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