संबुद्धकायस्फरणात् तथताव्यतिभेदतः। गोत्रतश्च सदा सर्वे बुद्धगर्भाः शरीरिणः॥
बुद्ध के ज्ञान के प्रकाश और तथता के अभेद तथा बुद्ध गोत्र होने से भी सभी शरीर धारी बुद्ध गर्भ के अन्तर्गत ही हैंl
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।