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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 54
यथा नाग्निभिराकाशं दग्धपूर्व कदाचन। तथा न प्रदहत्येनं मृत्युव्याधिजराग्नय:॥
जैसा कि अग्नि से कभी भी आकाश जलता नहीं हैं उसी प्रकार इस बोधि का जन्म, जरा और मृत्यु नहीं होते।
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