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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 4
यो बुद्धत्वमनादिमध्यनिधनं शान्तं विबुद्धः स्वयं बुद्धवा चाबुधबोधनार्थमभयं मार्ग दिदेश श्रुवम्‌। तस्मै ज्ञानकृपासिवञ्रवरधृग्दुःखाङ्करेकच्छिदे नानादृग्गहनोपगूढविमतिप्राकारभेत्ते नम:॥
उस दुःख के अङ्कुर को काटने वाले (बुद्ध को) नमस्कार है। जिस बुद्ध ने आदि, मध्य और अन्तिम रहित शान्त बुद्धत्व को स्वयं ही जानकर मूर्ख-अल्पज्ञ व्यक्तियों को निश्चित मार्ग का उपदेश दिया है, ऐसे ज्ञान कृपा रूपी उत्तम खड्ग के धारण से दुःख रूपी अङ्कुर का छेदन किया है तथा अनेक दिशाओं में परिव्याप्त, मजबूत विमति (मूर्खता) रूप प्राकार (दिवार) का भेदन किया है।
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