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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 87
सर्वाकाराभिसंबोधिः सवासनमलोदधृतिः। बुद्धत्वमथ निर्वाणमद्दयं परमार्थत:॥
सर्वाकाराभिसम्बोधि, वासनासहितमल का विनाश, बुद्धत्व और निर्वाण पारमार्थिक रूप में अद्वय ही है।
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