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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 113
तद्वन्मनोऽन्तर्गतमप्य चिन्त्यमक्षय्यधर्मामलरत्नकोशम्‌। अबुध्यमानानुभवत्यजन्त्रं दारिद्ग्रदुःखं बहुधा प्रजेयम्‌॥
उसी प्रकार मन के अन्दर अचिन्त्य रूप से रह रहे अक्षय धर्म हैं किन्तु वह अनेक कोषों से ढका हुआ है किन्तु बह व्यक्ति (मन) नहीं जानता वह अक्षय धर्म भी कुछ कहता नहीं अतः वह दारिद्र्य दुःख वैसा ही रहता है।
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