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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 77
एतां गतिमनुप्रा्तो बोधिसत्त्वस्तथागतैः। समतामेति लोकेषु सत्त्वसंतारणं प्रति॥
इस प्रकार के गति से सम्पन्न बोधिसत्त्व तथागत के समान ही हो जाते हैं क्योंकि प्राणियों के कल्याण के लिए ही यह सब हुआ करता है।
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