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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 111
यद्वत्‌ संकरपूतिधानपतितं चामीकरं देवता दृष्टा दृश्यतमं नृणामुपदिशेत्‌ संशोधनार्थं मलात्‌। तद्वत्‌ क्लेशमहाशुचिप्रपतितं संबुद्धरत्नं जिनः सत्त्वेषु व्यवलोक्य धर्ममदिशत्तच्छुद्धये देहिनाम्‌॥
जैसे की गाय के गोबर में फॅसे हुए अनेक धान आदि अन्नों को देखकर कोई देवता मुनिगणों को यह बताता है कि देखो वहाँ पर अन्न है आप लोग उसे लेकर शुद्ध करो और उससे अपना कार्य करो। इसी प्रकार महान्‌ अशुद्ध मलों में पतित बुद्ध रत्न को देखकर भगवान्‌ तथागत उन जनों को उपदेश देते है उसे शुद्ध कर अनेक कार्यों को करने के लिए।
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