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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 112
यथा दरिद्रस्य नरस्य वेश्मन्यन्तः पृथिव्यां निधिरक्षयः स्यात्‌। विद्यान्न चैनं स नरो न चास्मिन्नेषोऽहमस्मीति वदेन्निधिस्तम्‌॥
जैसे किसी अत्यन्त दरिद्र व्यक्ति के घर के भीतर अक्षय धन गढ़ा हुआ हो किन्तु वह घर धनी नहीं जानता और वह बहुमूल्य धन भी यह नहीं बताता की मैं यहाँ हूँ।
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