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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 121
अनाथशालेव भवोपपत्तिरन्तर्वतीस्त्रीवदशुद्धसत्त्वाः। तदगर्भवत्तेष्वमलः स धातुर्भवन्ति यस्मिन्सति ते सनाथाः॥
अनाथालय के तरह ही यह संसार है। गर्भिणी स्त्री के सदृश प्राणी, जो अशुद्ध हैं। गर्भ में स्थित राजा के तरह विशुद्ध धर्मधातु है, जिसके होने से वे सनाथ हो जाते हैं।
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