इन्हीं ६ गुणों का क्रमशः प्रथम तीन गुणों से निरोधसत्य का परीदीपन करके विराग का संग्रह किया गया है। अवशिष्ट तीनों से मार्गसत्य का परिदीपन करके विराग का हेतु ही अभिव्यक्त हुआ है। जो विराग है वह निरोध सत्य है, जिससे विराग मार्ग सत्य से दोनों ही अभि समय-व्यवदान सत्यरूप द्वयलक्षण ही विरागधर्म है ऐसा परिदीपन हुआ है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।