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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 11
निरोधमार्गसत्याभ्यां संगृहीता विरागिता । गुणैस्त्रिभिस्त्रिभिश्चैते वेदितव्ये यथाक्रमम्‌॥
इन्हीं ६ गुणों का क्रमशः प्रथम तीन गुणों से निरोधसत्य का परीदीपन करके विराग का संग्रह किया गया है। अवशिष्ट तीनों से मार्गसत्य का परिदीपन करके विराग का हेतु ही अभिव्यक्त हुआ है। जो विराग है वह निरोध सत्य है, जिससे विराग मार्ग सत्य से दोनों ही अभि समय-व्यवदान सत्यरूप द्वयलक्षण ही विरागधर्म है ऐसा परिदीपन हुआ है।
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