इसी प्रकार सुगत (बुद्ध) अपनी बुद्ध-दृष्टि से, अवीचि नरक में स्थित प्राणियों में भी अपने ही धर्मस्वभाव को देखते हैं; और करुणा से प्रेरित होकर, स्वयं आवरणों से रहित होते हुए, उन्हें उन आवरणों से मुक्त करते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।