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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 81
न जायते स नित्यत्वा दात्मभावैर्मनोमयैः। अचिन्त्यपरिणामेन ध्रुवत्वान्‌ प्रियते न सः॥
नित्य होने से पैदा नहीं होते, मनोमय आत्म भाव के कारण अचिन्त्य परिणाम युक्त भी हैं और ध्रुव होने से मरते भी नहीं हैं।
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