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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 41
भवनिर्वाणतद्दुःखसुखदोषगुणे क्षणम्‌। गोत्रे सति भवत्येतदगोत्राणां न विद्यते॥
संसार से मुक्‍त होने की कामना का बीज संसार के दुःखों का अनुभव और दु:खमयता का बोध। यह तभी होगा जब महायान गोत्र में साधक स्थिर है किन्तु अगोत्रो के लिए यह संभव नहीं है।
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