भवनिर्वाणतद्दुःखसुखदोषगुणे क्षणम्। गोत्रे सति भवत्येतदगोत्राणां न विद्यते॥
संसार से मुक्त होने की कामना का बीज संसार के दुःखों का अनुभव और दु:खमयता का बोध। यह तभी होगा जब महायान गोत्र में साधक स्थिर है किन्तु अगोत्रो के लिए यह संभव नहीं है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।