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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 30
सदा प्रकृत्यसंक्लिष्टः शुद्धरत्नाम्बराम्बुवत्‌। धर्माधिमुक्त्यधिप्रज्ञासमाधिकरुणान्वयः॥
सदैव प्रकृति से ही असंक्लिष्ट, शुद्ध रत्न और आकाश तथा जल के तरह धर्म के अधिमुक्ति तथा अधिप्रज्ञा, समाधि एवं करुणा से युक्त ही तथागत धातु या ज्ञान होता है।
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