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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 106
सत्त्वेष्वपि क्लेशमलोपसृष्ट-मेवं न तावत्कुरुते जिनत्वम्‌। संबुद्धकार्य त्रिभवे न यावद्विमुयते क्लेशमलोपसर्गात्‌॥
इसी प्रकार प्राणियों में भी क्लेशमलों से ज्ञान ढका हुआ होता है जब तक उन क्लेशों को दूर न किया जाय तब तक जिनत्व-तथागत धातु-ज्ञान प्रकट नहीं होता। अतः विद्वान्‌ वर्ग त्रिभव में क्लेशमलों को दूर करने के बाद ही संसार से मुक्त होते हैं।
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