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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 76
अनाभोगेन तस्यैवमव्याहतधियः सदा। जगत्याकाशपर्यन्ते सत्त्वार्थः संप्रवर्तते॥
हमेशा अनाभोग के द्वारा सर्वदा अपने तीव्र बुद्धि युक्त वे संसार में आकाश पर्यन्त प्राणियों के कल्याणार्थ लगे ही रहते हैं।
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