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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 1 • श्लोक 105
धान्येषु सारं तुषसंप्रयुक्तं नृणां न यद्वत्परिभोगमेति। भवन्ति येऽन्नादिभिरर्थिनस्तु ते तत्तुषेभ्यः परिमोचयन्ति॥
धान्यों के बाहर भूषा रहता है, जब तक उसे अलग नहीं किया जाता तब तक उस चामल (सार) को ग्रहण नहीं किया जा सकता अतः जो अन्नार्थी हैं सबसे पहले तुष-भूषा को अलग करते हैं।
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